गुरुवार, 15 जुलाई 2010

पत्रकार का कैमरा छीनने व गालीगलौज करने वालों की गिरफ्तारी की मांग

मीडिया के साथ दुर्रव्यवहार की बठिंडा इलेक्ट्रानिक मीडिया एसोसिएशन ने की निदां
बठिंडा। गिदड़बाहा में आपरेशन ग्रीन हंट विरोधी जमहुरी फ्रंट पंजाब द्वारा हिमांशु कुमार के नेतृत्व में हो रहे प्रोग्राम की कवरेज कर रहे एक न्यूज चैनल के पत्रकार से हिमांशु कुमार के साथियों द्वारा कैमरा छीनने व गालीगालौज करने की बठिंडा के इलेक्ट्रानिक मीडिया एसोसिएशन ने सख्त शब्दों में निंदा की है। वहीं खुलेआम घूम रहे आरोपियों की तुरंत गिरफ्तारी की मांग भी की है। इस मामले संबंधी में बठिंडा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एसोसिएशन की एक बैठक प्रधान पीएस मिट्ठा की अध्यक्षता में हुई। जिसमें एसोसिएशन के पैर्टन स्वर्ण सिंह दानेवालिया, पीआरओ राम सिंह गिल, मेंबर राकेश कुमार, अशोक शर्मा, पवन बांसल सहित सभी ने बढ़कर हिस्सा लिया। बैठक में प्रधान पीएस मिट्ठा ने बताया कि १३ जुलाई गिदड़बाहा में आपरेशन ग्रीन हंट विरोधी जमहुरी फ्रंट पंजाब द्वारा हिमांशु कुमार के नेतृत्व में एक समारोह किया जा रहा था। इस दौरान हिमांशु कुमार के साथियों ने प्रोग्राम की कवरेज कर रहे एक नेशनल हिंदी न्यूज चैनल के रिपोर्टर सूरज भान का कैमरा छीन लिया व उसके साथ गालीगलौज की। एसोसिएशन के सदस्यों ने कहा कि पत्रकार के साथ हुई घटना की जितनी निंदा की जाए, उतनी कम है। पीआरओ राम सिंह गिल ने बताया कि स्थानीय पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ धारा ३८२,३४२,५०६,१४८,१४९ आईपीसी के तहत केस दर्ज किया है लेकिन उसके बावजूद भी आरोपी सरेआम घूम रहे हैं। एसोसिएशन ने मांग की है कि आरोपियों की जल्द से जल्द गिरफ्तारी उनके खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए।
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बुधवार, 14 जुलाई 2010

अब बापू पर अश्लीलता की गोलियां

कमाई के लालच में अंधे हुए लोगों का अब निशाना गांधी बने हैं। अश्लीलता भरी चीजें परोस रातोंरात बेशुमार पैसा कमाने की कुत्सित चाह रखने वालों ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को भी नहीं बक्शा और उन पर अश्लीलता भरी शर्मनाक किताब रच डाली। और अब वह किताब शहर में मजे से बिक रही है। रंगीला गांधी नाम से बिक रही पुस्तक में जिस हद तक अश्लील वर्णन किए गए हैं, उसे देख तो कोई भी शर्मसार हो जाए। यह अश्लील किताब राजस्थान और पंजाब के साथ आसपास क  में धड़ल्ले से बिक रही है। यहीं नहीं किताब इतनी पापूलर हो रही है कि लोग इसकी फोटो कॉपी करवाकर भी पढ़ रहे हैं। विभिन्न विश्वविद्यालयों में भी ये पुस्तक छात्रों के बीच चर्चित हो रही है।



शर्मशार कर देने वाले शब्दों का पुंज



महात्मा गांधी के बारे में ऐसे शब्दों का प्रयोग किया गया है जो पढऩे वाला भी शर्मशार हो जाए। गांधी के बारे में बताया कि वो कैसे लड़कियों को ब्रह्मचर्य का प्रयोग करना सिखाते थे। उसमें दिया हुआ है कि उनकी शेतानियत का भांडा फोड़ उनके ही निजी सचिव निर्मल कुमार बोस ने किया। इस पुस्तक में उस समय की प्रसिद्ध महिलाओं के कुछ अन्य पुस्तकों के हवाले से लिखा गया है तथा महात्मा गांधी के साथ उनके संबंधों के बारे में बताया गया है।



बापू नगर में बापू के नाम 



रंगीला गांधी नाम की जो किताब शहर में बेची जा रही है। किताबों के आवरण पृष्ठ पर गांधीजी की फोटो दी गई है, जो अपनी दो शिष्याओं के कंधे पर हाथ रखे दिखाए गए हैं। ये किताब बापू नगर में भी बिक रही है।



कहां से प्रकाशित



किताब पर प्रकाशक का नाम भीम पत्रिका पब्लिकेशंज जालंधर दिया गया है। जिस पर जयपुर में चंद्रवाल साहित्य बुक सेंटर बी 75 नीति मार्ग बजाज नगर नामक बुक सेंटर की मुहर लगी हुई है। 



पुस्तक के आवरण पर



रंगीला गांधी नाम पुस्तक के मुख प्रष्ट पर मूल लेखक के नाम के रूप में एल.आर.बाली का नाम दिया हुआ है तथा उनके नीचे अनुवादक के रूप में सूर्यकांत शर्मा का नाम दिया हुआ है। अंतिम पेज पर श्री रतन लाल सांपला संस्थापक बुद्ध ट्रस्ट सोफी पिंड जिला जालंधर पंजाब लिखा हुआ है उसके नीचे लिखा है कि जिनकी प्रेरणा व सहायता से ये पुस्तक प्रकाशित हुई।



आंदोलन की तैयारी



छात्र नेता नरसी किराड़ ने बताया कि इस तरह की किताब की फोटोकॉपी राजस्थान विश्वविद्यालय में भी छात्रों के पास देखी गई हैं। जब महात्मा गांधी जी को राष्ट्रपिता का दर्ज है तो उनके खिलाफ अपशब्द लिखना गलत है। किताब लिखने वालों के खिलाफ आंदोलन चलाएंगे और किताब की होली जलाएंगे।

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

सीआईडी अफसर या फिर पत्रकार?

बठिंडा। जिले में एक ऐसा सख्श  आजकल चर्चा में है जो स्वयं को कभी सीआईडी तो कभी आरबीआई का अफसर तो कभी इलैक्ट्रोनिक व प्रिंट मीडिया का पत्रकार कहकर पैसे एठने का काम कर रहा है। महोदय उक्त काम अकेला नहीं अपितुं दो अन्य पत्रकारों के साथ मिलकर करते है। पीली पत्रकारिता के इस धंधे में उक्त लोग आए दिन लोगों को गुमराह करने के साथ उनके अवैध धंधे को सार्वजनिक करने की धमकी देकर मोटी उग्राही करते हैं। एक सज्जन पिछले दिनों मेरे पास आए। उन्होंने अपने साथ हुए एक घटनाक्रम की जानकारी मुझे दी तो इन तीन महोदयों का जिक्र भी होने लगा। उन्होंने बताया कि इसमें एक पत्रकार कभी किसी अखबार का तो कभी किसी चैनल का स्वयं को प्रतिनिधि बताता है जबकि वह है नहीं, यही नहीं उसके साथ दो अन्य साथी भी होते हैं जो टीवी चैनल के रिपोर्टर बताते हैं। इसमें महानगर के होटल संचालकों, थानों में आने वाले परिवारिक कलहों के मामलों के साथ पैसे वाली असामी के अवैध संबंधों की पुख्ता जानकारी अपने पास होने की बात कहकर मनचाहे दाम वसूल कर लेते हैं। पहली बार बात एक लाख से शुरू होती है जो २० से ३० हजार में आकर तय हो जाती है। फिलहाल उक्त महोदयों ने जिले के दूसरे पत्रकारों को भी बदनाम कर रखा है। वही स्वयं को सीआईडी व आरबीआई जैसी सुरक्षा एजेंसी का प्रतिनिधि बताकर सुरक्षा एजेंसियों को भी धोखा देने में लगे हैं। फिलहाल यहां जरूरत है इस तरह के तत्वों को रोकने की जो पत्रकार और पत्रकारिता को बदनाम करने में तुले हैं। 

दैनिक जागरण अखबार के खिलाफ आरएमपी डाक्टरों का प्रदर्शन

बठिंडा जिले से खबर है कि वहां बड़े पैमाने पर दैनिक जागरण अखबार के खिलाफ आरएमपी डाक्टरों ने विरोध प्रदशर्न कर दफ्तर का घेराव किया। राज्य भर से इकट्ठे हुए आरएमपी डाक्टरों ने एक घंटे तक रास्ता भी जाम रखा। इस दौरान झोलाछाप डाक्टरों ने अखबार प्रबंधकों के खिलाफ भी नारेबाजी कर अखबार की तरफ से आरएमपी डाक्टरों के खिलाफ चलाई जा रही मुहिम को बंद करने की मांग रखी। इस दौरान दैनिक जागरण अखबार के घोडा चौक स्थित दफ्तर पर सुरक्षा के व्यापक प्रबंध कर रखे थे जिसके चलते इस दौरान दफ्तर से आवागमन पूरी तरह से बंद रहा। दूसरी तरफ अखबार से दो टूक शब्दों में झोलाछाप डाक्टरों की तरफ से दबाब बनाने के लिए किए जा रहे इस तरह के प्रदशर्नों से दबाब में आए बिना अपने अभियान को जारी रखने की घोषणा की है। यहां बताना जरूरी है कि दैनिक जागरण अखबार की तरफ से लोगों की जान आफत में डालने वाले आरएमपी डाक्टरों के खिलाफ प्रदेश स्तरीय अभियान शुरू कर रखा है। इसमें अनक्वालीफाईड डाक्टरों की तरफ से की जा रही कारगुजारी को उजागर किया जा रहा है। इस अभियान के बाद अखबार को राज्य के कई हिस्सों में आरएमपी डाक्टरों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। इसके बावजूद उक्त अभियान निरंतर चल रहा है।  

सोमवार, 12 जुलाई 2010

पत्रकारिता नहीं, पत्रकार बिक रहे

Tuesday, 13 July 2010 10:39 एसएन विनोद भड़ास4मीडिया -

: नहीं! ऐसा बिल्कुल नहीं! पत्रकारिता नहीं बिक रही, बिक रहे हैं पत्रकार। ठीक उसी तरह जैसे कतिपय भ्रष्ट शासक-प्रशासक, जयचंद-मीर जाफर देश को बेचने की कोशिश करते रहे हैं, गद्दारी करते रहे हैं। किन्तु देश अपनी जगह कायम रहा। नींव पर पड़ी चोटों से लहूलुहान तो यह होता रहा है किन्तु अस्तित्व कायम।
पत्रकारिता में प्रविष्ट काले भेडिय़ों ने इसकी नींव पर कुठाराघात किया, चौराहे पर अपनी बोलियां लगवाते रहे, अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए सौदेबाजी करते रहे, कलमें बेचीं, अखबार के पन्ने बेचे, टेलीविजन पर झूठ को सच-सच को झूठ दिखाने की कोशिश की, किसी को महिमामंडित किया तो किसी के चेहरे पर कालिख पोती, इसे पेशा बनाया, धंधा बनाया, चाटुकारिता की नई परंपरा शुरू की। बावजूद इसके, पत्रकारिता अपनी जगह कायम है, पत्रकार अवश्य बिकते रहे। प्रसून (पुण्य प्रसून वाजपेयी) निश्चय ही अपने शब्दों में संशोधन कर लेंगे।
खुशी हुई कि 'लॉबिंग, पैसे के बदले खबर और समकालीन पत्रकारिता' पर अखबारों और न्यूज चैनलों के कतिपय वरिष्ठ पत्रकारों ने (आत्म) चिंतन की पहल की। पत्रकारों के पतन पर चिंता जताई। अवसर था उदयन शर्मा फाउंडेशन द्वारा आयोजित संवाद का। इस पहल का स्वागत तो है किन्तु कतिपय शर्तों के साथ। एक चुनौती भी। पत्रकार, विशेषकर इस चर्चा में शामिल होने वाले पत्रकार पहले 'हमाम में सभी नंगे' की कहावत को झुठलाकर दिखाएं। इस बिंदु पर मैं पत्रकारीय मूल्य के पक्ष में कुछ कठोर होना चाहूंगा। बगैर किसी पूर्वाग्रह के, बगैर किसी दुराग्रह के और बगैर किसी निज स्वार्थ के मैं यह जानना चाहूंगा कि क्या संवाद में शामिल हो बेबाक विचार रखने वाले वरिष्ठ पत्रकारों ने मीडिया में प्रविष्ट 'रोग' के इलाज की कोशिशें की हैं? अवसर मिलने के बावजूद क्या ये तटस्थ नहीं बने रहे? बाजारवाद, कार्पोरेट जगत की मजबूरी आदि बहानों की ढाल के पीछे स्वयं कुछ पाने की कोशिश नहीं करते रहे?
राजदीप सरदेसाई 'पेड न्यूज' के लिए बाजारीकरण को जिम्मेदार अगर ठहराते हैं तो उन्हें यह भी बताना होगा कि मीडिया पर बाजार के प्रभाव को रोका जा सकता है या नहीं? हां, राजदीप की इस साफगोई के लिए अभिनंदन कि उन्होंने स्वीकार किया कि आज मीडिया राजनेताओं को तो एक्सपोज कर सकता है लेकिन कार्पोरेट को नहीं। क्यों? बहस का यह एक स्वतंत्र विषय है। कार्पोरेट को एक्सपोज क्यों नहीं किया जा सकता? वैसे पत्र और पत्रकार मौजूद हैं जो निडरतापूर्वक कार्पोरेट जगत को एक्सपोज कर रहे हैं।
अगर राजदीप का आशय पूंजी और विज्ञापन से है तो मैं चाहूंगा कि वे इस तथ्य को न भूलें कि पूंजी का स्रोत आम जनता ही है। हालांकि वर्तमान काल में पूंजी, जो अब कार्पोरेट जगत की तिजोरियों की बंदी बन चुकी है, हर क्षेत्र को 'डिक्टेट' कर रही है। स्रोत से जनता को जोड़कर देखने की चर्चा नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह जाती है। किन्तु मीडिया जगत, मीडिया कर्मी जब स्वयं को औरों से पृथक, ज्ञानी, समाज-देश के मार्गदर्शक के रूप में पेश करते हैं तब उन्हें परिवर्तन और पहल के पक्ष में क्रांति का आगाज करना ही होगा। कार्पोरेट के सामने नतमस्तक होने की बजाय शीश उठाकर चलने की नैतिकता अर्जित करनी होगी। यह मीडिया ही कर सकता है। संभव है यह। सिर्फ सच बोलने और सच लिखने का साहस चाहिए।