शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

झगड़े में फंसा जम्‍मू से भास्‍कर का प्रकाशन

टाइटिल वेरिफिकेशन और डिक्लयरेशन पर स्टे : भास्कर घराने का झगड़ा डीबी कार्प वालों को भारी पड़ता दिख रहा है. ताजी खबर जम्मू से है. डीबी कॉर्प ने 25 मई, 2010 को जम्‍मू से दैनिक भास्‍कर के प्रकाशन के लिये टाइटल वेरिफिकेशन के लिये आवेदन किया था. जम्‍मू जिला प्रशासन ने 2 जून को आरएनआई से राय मांगी. 9 जून को आरएनआई ने वेरिफिकेशन पर मुहर लगा दी. 15 जून 2010 को डीबी कॉर्प ने जिला प्रशासन जम्‍मू के यहां डिक्‍लयरेशन फाइल कर दिया.
24 जुलाई से जम्‍मू से अखबार लॉचिंग की खबर बाजार में आ गई.. दैनिक भास्‍कर के को-ऑनर संजय अग्रवाल ने 21 जुलाई को 2010 को जिला प्रशासन जम्‍मू के यहां अपनी आपत्ति दर्ज कराई. 22 जुलाई को जम्‍मू से प्रकाशन रोकने के लिये टाइटल वेरिफिकेशन एवं डिक्‍लयरेशन के खिलाफ जम्‍मू हाईकोर्ट में रिट पिटीशन फाइल किया. आज जम्‍मू हाईकोर्ट की जस्टिस सुनील हाली की बेंच ने संजय अग्रवाल का डीबी कॉर्प के 9 जून के टाइटल वेरिफिकेशन एवं 15 जून के डिक्‍लयरेशन पर स्‍टे देते हुए जिला प्रशासन जम्‍मू को उचित कार्रवाई के निर्देश दिए. संजय अग्रवाल ने अपनी रिट पिटीशन में डी बी कॉर्प, जिला प्रशासन जम्‍मू, आरएनआई एवं सूचना प्रसारण मंत्रालय को पार्टी बनाया था.
संजय अग्रवाल के 22 जुलाई को हाईकोर्ट पहुंचने की खबर जब डी बी कॉर्प के लोगों तक पहुंची तब उन्‍होंने आनन-फानन में वकीलों की सलाह पर दैनिक भास्‍कर का 21 जुलाई का अखबार छापकर उसकी प्रति 23 जुलाई को जिला प्रशासन जम्‍मू के यहां जमा कराई. 23 जुलाई को जब संजय अग्रवाल जिला प्रशासन के समक्ष हाईकोर्ट के निर्देश की प्रति लेकर पहुंचे उसी समय दैनिक भास्‍कर की ओर से 21 जुलाई का अखबार वहां जमा किया गया. जबकि डीबी कॉर्प 24 जुलाई को जोर-शोर से भास्‍कर के जम्‍मू से प्रकाशन की योजना बना रहा था. हालांकि हाईकोर्ट के फैसले की औपचारिक प्रति सोमवार को मिलेगी.
इसके पूर्व रांची से भी दैनिक भास्‍कर के प्रकाशन की तैयारियों के बीच संजय अग्रवाल ने डीबी कॉर्प के रांची से प्रकाशन के खिलाफ दिल्‍ली हाईकोर्ट से स्‍टे ले रखा है. इसे वैकेट कराने के लिये आठ करोड़ राची में इनवेस्‍टमेंट एवं 400 कर्मचारियों की नियुक्ति का वास्‍ता देकर डी बी कॉर्प की तरफ से कांग्रेस नेता एवं एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने हाईकोर्ट में गुहार लगाई थी लेकिन सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने स्‍टे वैकेट न कर 28 जुलाई की तिथि निर्धारित की है.
सौजन्यः-भडा़स फोर मीडिया डाट काम  

अमर उजाला, आगरा में चल रहा है 'सफाई' अभियान

अमर उजाला, आगरा का माहौल भी बेहद गरम है. पिछले दिनों दो लोगों को हटाए जाने और दो को कार्यमुक्ति का नोटिस दिए जाने के बाद अब पता चल रहा है कि कुल छह लोगों को बाहर निकाले जाने की तैयारी है जिसमें सीनियर सब एडिटर और सब एडिटर भी शामिल हैं. खासकर उन लोगों को निशाना बनाया जा रहा है जो या तो बहुत पुराने हैं या बिलकुल नए. जितने भी ट्रेनी रखे गए थे, उन्हें हटाकर फिर से नए ट्रेनी भर्ती किए जा रहे हैं.
कभी अजय अग्रवाल, फिर अशोक अग्रवाल की यूनिट माने जाने वाली आगरा यूनिट अब पूरी तरह से माहेश्वरी ब्रदर्स के अधीन है. माहेश्वरी ब्रदर्स के खास आदमी के रूप में राजेंद्र त्रिपाठी आगरा में संपादक पद पर तैनात हैं और सफाई अभियान चला रहे हैं. इस अभियान के पीछे मंशा पुराने समय के निष्ठावान लोगों को किनारे लगाना या बाहर करना है और नए मैनेजमेंट के लायल लोगों को बढ़ावा देना व भर्ती करना है. देखना है कि उठापटक का यह दौर कब खत्म होता है.

 अमर उजाला, कानपुर से कई खबरें हैं. दैनिक भास्कर, पटियाला के सीनियर रिपोर्टर संदीप अवस्थी यहां प्रिंसिपल करेस्पांडेंट पद पर ज्वाइन करने वाले हैं. रवींद्र नाथ झा न्यूज एडिटर के रूप में अमर उजाला, कानपुर में दस्तक देने वाले हैं. चर्चा है कि उन्हें अमर उजाला के टैबलायड अखबार कांपैक्ट का प्रभारी बनाया जाएगा.
अभी तक प्रभारी के रूप में महेश शर्मा काम देख रहे हैं. सिटी चीफ के रूप में काम देख रहे कौशल किशोर का प्रादेशिक डेस्क का प्रभारी बनाया गया है. प्रादेशिक डेस्क को दो हिस्से में बांटा गया है. एक हिस्से के प्रभारी जेपी त्रिपाठी बनाए गए हैं और दूसरे हिस्से के प्रभारी की जिम्मेदारी कौशल किशोर को दी गई है. फिलहाल सिटी चीफ की जिम्मेदारी शैलेश अवस्थी को दी गई है. तीन लोगों ने अमर उजाला,  कानपुर से नाता तोड़ लिया है. ये हैं न्यूज एडिटर धीरेंद्र प्रताप सिंह, सीनियर सब एडिटर कुमार विजय और सब एडिटर मनोज सिंह.
मनोज सिंह के बारे में सूचना है कि वे दैनिक जागरण, लखनऊ के साथ जुड़ गए हैं. नाराज होकर इस्तीफा देने वाले सीनियर सब एडिटर विवेक त्रिपाठी ने अपना इस्तीफा वापस ले लिया है और फिर से वे अमर उजाला, कानपुर में सक्रिय हो गए हैं. अमर उजाला, कानपुर यूनिट से संबद्ध दो जिलों के ब्यूरो चीफों का भी तबादला किया गया है, फर्रूखाबाद के ब्यूरो चीफ राजीव शुक्ला को हरदोई और हरदोई के ब्यूरो चीफ ब्रजेश शुक्ला को फर्रूखाबाद का ब्यूरो चीफ बनाया गया है. इन तमाम बदलावों, ज्वाइनिंग, गतिविधियों से अमर उजाला कानपुर का माहौल सरगर्म बना हुआ है.
सौजन्यः-भडा़स फोर मीडिया डाट काम  

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

सड़कों पर बेखौफ दौड़ रहे हैं प्रेस लिखे वाहन

-कई लोगों का तो प्रेस और पत्रकारिता से दूर का भी संबंध नहीं
-अपने फायदे केञ् साथ लोगों पर रौब झाड़ने केञ् लिए करते हैं गलत इस्तेमाल 
संजय शर्मा 
बठिंडा। व्यवसायिक फायदा उठाने व लोगों पर रौब झाड़ने के लिए इन दिनों मीडिया के लिए प्रयुक्त होने वाले प्रेस का जमकर इस्तेमाल किया जा रहा है। मोटरसाइकिलों से लेकर कारों में प्रेस लिखकर गाड़ी सड़कों पर आवागमन करती आसानी से दिखाई देते हैं। इसमें ज्यादातर लोग ऐसे है जिनका मीडिया से दूर-दूर तक का कुछ नहीं लेना है लेकिन उन्होंने कार व मोटरसाइकिल में आगे व पीछे बडे़-बडे़ अक्षरों में प्रेस लिखकर लगा रखा है। इसमें कई लोग तो ऐसे है जो मीडिया कर्मी के रिश्तेदार या फिर दोस्तों की श्रेणी या फिर जानपहचान वालों में होते हैं। इस तरह के वाहनों को पुलिस कर्मचारी भी जांच पड़ताल नहीं करते हैं जिससे कई बार उक्त लोग इन वाहनों का इस्तेमाल गैरकानूनी कार्यों के लिए करते हैं। पिछले दिनों प्रेस लिखे कई ऐसे वाहन पुलिस ने पकडे़ हैं जिसमें गैरकानूनी तौर पर दवाईयां या फिर टैक्स चोरी का सामान लादकर लाया जा रहा था। इस मामले में बठिंडा जिले के विभिन्न सामाचार पत्रों के प्रतिनिधि जिला प्रशासन से सख्त कार्रवाई करने की मांग कर चुके हैं लेकिन इसमें आज तक किसी तरह की कार्रवाई नहीं की जा सकी है। 
तीन साल पहले पुलिस प्रशासन ने प्रेस लिखे ऐसे वाहनों की जांच पड़ताल करवाने व इन्हें जब्त करने का अभियान शुरू किया था। इसके तहत सभी अखबारों के प्रतिनिधियों से उनके यहां काम करने वाले लोगों की सूचि मांगी गई थी। इसमें पत्रकार का नाम, पता, फोन नंबर के इलावा इस्तेमाल किए जा रहे वाहन का नंबर, ड्राइविंग लाइसेंस का नंबर मांगा गया था। इस मुहिम में प्रशासन की तरफ से जायज पत्रकारों को एक परिचय पत्र जारी किया जाना था। इस परिचय पत्र के धारक ही अपने वाहनों में प्रेस लिख सकते थे लेकिन यह मुहिम भी प्रशासन पूरी नहीं कर सका और उसने फार्म जमाकर आगे किसी तरह की कार्रवाई नहीं की। फिलहाल प्रशासन की ढिली नीतियों के कारण सड़कों में बेखौफ दौड़ते प्रेस लिखे वाहन लोगों के साथ पुलिस कर्मचारियों के लिए परेशानी का सबब बने हुए है। इस मामले में चिंताजनक पहलु यह है कि इस तरह के वाहनों से गौरकानूनी कार्यों के साथ असामाजिक तत्व व देश द्रोही तत्वों को संरक्षण मिल सकता है जो किसी भी समय प्रेस के नाम पर किसी अनहोनी घटना को अंजाम दे सकते हैं। इस तरह के तत्वों पर रोक लगाने के लिए प्रशासन को जल्द सख्त से सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। यहां बताना जरूरी है कि अधितकर वाहन चालक को अपने वाहनों में प्रेस मात्र इसलिए लिखाकर रखते हैं कि किसी चौक व नाके में पुलिस कर्मी उन्हें नहीं रोकेगा व दस्तावेज की मांग नहीं करेगा। इस क्रम में तत्कालीन एसपी सीटी निलाभ किशोर ने एक मुहिम के तहत प्रेस लिखे वाहनों की जांच शुरू की थी तो उसमें पाया गया कि ७० फीसदी लोगों ने अपने वाहनों में प्रेस इसलिए लिखाकर रखा है कि उन्हें कोई पत्रकार जानता है या फिर किसी अखबार व पत्रिका से उन्होंने जानपहचान के आधार पर प्रेस का कार्ड बनवा रखा है जबकि खबरे भेजने या फोटो खीचने जैसे कार्यों से उनका कोई भी लेना देना नहीं होता है। समाज सेवी राकेश नरुला का कहना है कि इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए अखबार प्रतिनिधियों को भी आगे आना होगा उन्हें ऐसे लोगों को परिचय पत्र जारी करने से गुरेज करना चाहिए जिनका पत्रकारिता से किसी तरह का लेना देना नहीं है व प्रेस लिखकर वह प्रेस का इस्तेमाल करते हैं। वही जिला प्रशासन को भी इस बाबत अखबार प्रतिनिधियों के साथ मिलकर ऐसी नीति बनानी चाहिए जिससे इस तरह केञ् गौरखधंधे पर रोक लगे।

सोमवार, 19 जुलाई 2010

पेड न्यूज और पैसे की हेराफेरी के बारे में दर्जनों जगह भेजी शिकायत

: दैनिक जागरण से चीफ रिपोर्टर पद से इस्तीफा देने वाले राकेश शर्मा ने कई सनसनीखेज खुलासे किए हैं. उन्होंने दैनिक जागरण पर लगे पेड न्यूज के आरोपों को पुख्ता कर दिया है. सेबी को लिखे अपने पत्र में राकेश ने विस्तार से सारी बातें कहीं हैं जिसे नीचे प्रकाशित किया गया है.
राकेश शर्मा ने जागरण के साथ 10 अप्रैल 2002 से पारी शुरू की. तब उन्हें करनाल में ज्वाइन कराया गया था. 1 मार्च 2005 को उन्हें कुरुक्षेत्र भेज दिया गया. 5 मई 2008 को फरीदाबाद ट्रांसफर हो गया. 26 दिसंबर 2009 को उन्हें ट्रांसफर कर पंजाब के रोपड़ भेज दिया गया. राकेश ने 2 फरवरी 2010 को अपना इस्तीफा सौंप दिया. राकेश शर्मा ने अपने कार्यकाल में दो लोकसभा चुनाव और दो विधानसभा चुनाव कवर किए हैं.
बीते लोकसभा -विधानसभा चुनाव में राकेश फरीदाबाद में हुआ करते थे. उससे पहले जो लोकसभा चुनाव व विधानसभा चुनाव हुए थे, राकेश करनाल में दैनिक जागरण के लिए कार्यरत थे. राकेश ने दैनिक जागरण की जो शिकायत सेबी, चुनाव आयोग, राष्ट्रपति, प्रेस काउंसिल आदि को भेजी है, उसमें काफी कुछ कहा गया है. साथ में उन्होंने पेड न्यूज के रूप में लिए गए पैसे की डिटेल भी भेजी है. सारे दस्तावेज यहां प्रकाशित किए जा रहे हैं. -एडिटर

सौजन्यः-भडा़स4मीडिया डाट काम  

रेटिंग के चक्कर में न्यूज चैनल मन-मस्तिष्क कर रहे हैं दूषित :

 टक पटक कर मार डाला... भाई-बहन का रिश्ता हुआ शर्मसार... ममता हुई कलंकित... इस तरह की सुर्खियां आजकल हर न्यूज चैनल की पहली हेडलाइन होती है। टीवी खोलते ही इस तरह की खबरें देखकर कई बार बुरी तरह से इरीटेशन होता है. मुझे लगता है कि ऐसा केवल मेरे साथ नहीं बल्कि कइयों के साथ होता है. पत्रकारिता से जुड़े होने के कारण इसकी वैल्यू को समझता हूं. कई बार ऐसे मौके आए जब इस तरह की खबरों को सनसनीखेज बनाने के लिए मीटिंग में माथापच्ची करनी पड़ती थी. दरअसल यह बात इसलिए भी कर रहा हूं कि मुझे अपने एक संपादक की बात याद आ गई।। 
आत्महत्या की एक खबर पर वो सिर्फ इसलिए जोरदार भड़क गए थे कि मेरे सहयोगी रिपोर्टर ने हेडलाइन से लेकर खबर में भी दो-तीन जगह 'सल्फास खाकर युवक ने खुदकुशी की', लिख दी थी. पहले तो इतनी छोटी सी भूल के लिए इतने जोरदार गुस्से के लिए हम लोगों ने उन्हें काफी कोसा था. उनका कहना था कि जहर खाकर आत्महत्या लिखना काफी है, क्यों हम लोगों को आत्महत्या वाली दवाइयों का नाम प्रचारित कर रहे हैं. अब उनकी बात को याद करके लगता है कि हम खबरों को सनसनीखेज बनाने के चक्कर में क्या क्या गलती करते हैं.। मेरा मानना है कि कोई व्यक्ति या समुदाय का कोई भी कदम विचारधारा की परिणिति होती है. विचारधारा समाज और इसमें होने वाली घटनाओं को महत्व देने से बनती है. हम अक्सर देखते हैं कि किसी हादसे या घटना के पक्ष-विपक्ष में होने वाली प्रतिक्रया को जनभावना के रूप में प्रचारित किया जाता है. लेकिन वास्तव में ये जनभावनाएं नहीं होती. इसमें कुछ ऐसी विचारधारा होती है, जो कहीं कहीं से बायस्ड होती है. जिसका परिणाम हर उस व्यक्ति को भुगतना पड़ता है, जो इससे प्रभावित हुआ है. बार-बार इस तरह की घटनाओं के सुनने या देखने से यह भी लगता है कि लोगों ने इस ढ़ंग से अपनी तकलीफ या समस्या को कम करने की कोशिश की थी, भले ही वे सफल हुए या नहीं,  इससे उन्हे कोई फर्क नहीं पड़ता. आपने देखा होगा कि मीडिया में किसी घटना के जरूरत से ज्यादा प्रचारित होने पर आसपास या कहीं और उसकी पुनरावृत्ति होती है। कुल मिलाकर मेरा कहना है कि टीआरपी के चक्कर में हम लोगों के मन मस्तिष्‍क को किस तरह दूषित कर रहे हैं,  इसका भी ध्यान रखना चाहिए. केवल साप्ताहिक रेटिंग के लिए हम अपने दायित्वों और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों न भूलें तो हम एक अच्छा वातावरण बना सकते हैं. नेशनल चैनल में तो फिर भी स्थिति थोड़ी ठीक है, लेकिन रीजनल चैनलों ने पूरी सीमाएं ही लांघ दी हैं. वहां बैठे वरिष्ठ संपादक और अनुभवी लो यह भी भूल जाते हैं कि उनके चैनल को घर परिवार में छोटे से लेकर बड़े बुजुर्ग भी देखते हैं. टिकर और ब्रेकिंग खबरें तो ऐसी चलती हैं, जैसे अपराध नहीं हुए तो चैनल बंद हो जाएगा। मेरा यह भी नहीं कहना है कि चैनल को गुडी-गुडी होना चाहिए, लेकिन लोगों के पास ढेरों समस्याएं है, उनका निराकरण कर गैरजिम्‍म्‍ेदार लोगों को बेनकाब किया जा सकता है. समाज में ज्यादा से ज्यादा अच्छाई लाने और बुराइयों को खत्म करने की कोशिश होनी चाहिए. न कि गलत कामों को इस तरह पेश किया जाए कि लोग उसकी तरफ आकर्षित हों. हम ऐसे लोगों को सामने लाने से सिर्फ इसलिए परहेज करते हैं, क्योंकि वे लोग प्रभावशाली होते हैं. मेरा कहना है कि प्रभावशाली और दबंग लोगों की असलियत सामने लाकर भी टीआरपी बढ़ायी जा सकती है.
लेखक समरेंद्र रायपुर के निवासी हैं